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ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस नीति से सम्बंधित सुझाव दें और सरकारी संगठनों में इसको कार्यान्वित करने का तरीका सुझाएँ

Give your inputs on the Open Application Programming Interface (API) policy and suggest implementation approach across the government
आरंभ करने की तिथि :
Jan 01, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 11, 2014
04:15 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

डाटा, एप्लीकेशन और संसाधन के अंतर्संचालनीयता के लिए पारिस्थितिकी ...

डाटा, एप्लीकेशन और संसाधन के अंतर्संचालनीयता के लिए पारिस्थितिकी तंत्र बनाने हेतु सरकारी संगठन द्वारा प्रदान किये जाने वाले ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस के लिए एक नीति तैयार करने की जरूरत है। “भारत सरकार के लिए ओपन एपीआई" नीति का निर्माण सरकारी संगठनों में ओपन एपीआई के औपचारिक प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया है। यह नीति सभी ई-शासन संबंधी एप्लीकेशन और प्रणाली के सॉफ्टवेयर अंतर्संचालनीयता को बढ़ावा देने और डाटा और सेवाएँ नागरिकों और अन्य हितधारकों को उपलब्ध करा कर उनकी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओपन एपीआई का प्रयोग सरकार द्वारा कैसे किया जाना चाहिए इसके बारे में जानकारी प्रदान करती है।

हम नीति और सरकारी संगठनों में इसको कार्यान्वित करने हेतु अपने सुझाव साझा करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

ओपन एपीआई नीति के बारे में विस्तृत जानकारी यहाँ से प्राप्त करें - http://mygov.in/uploads/documents/Draft_Policy_on_Open_APIs.pdf

सुझाव भेजने की अंतिम तिथि 10 नवम्बर 2014 है।

फिर से कायम कर देना
2086 सबमिशन दिखा रहा है
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
"तीर्थस्थल के नागा" लोगो की तस्वीर एक फोटो एल्बम में लिए दिखा रहे थे की ये "नागा" लोग नदी के किनारे या फिर मंदिर में ताप कर रहे है इनको कुछ दान करो ... और दुसरे वाले जो साधू वेश में थे उनके हाथ में एक मोटा करीब ढाई फीट का साँप था उस साँप को दिखा कर पैसे मांगता था और जो नहीं देता उसके गले में साँप को डाल देता...लोग डर से पैसे दे देते.. अगर कोई फिर भी नहीं दिया तो उसके पास एक थैला भी था जिसमे एक लकड़ी की बनी हुई टोकरी थी उसके अन्दर काला साँप भी रखा था उस साँप को निकाल कर साँप पर ऊँगली मार के ...
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
बदतमीजी से बात करना" ये उठ यहाँ से कहीं और जा, चल सामान रखने की जगह दे, खड़े होने की जगह दे, टोकरी रखने की जगह दे" ये सभी बाते झेलनी पड़ी...आगे क्या हुआ अभी और भी है बात यही ख़तम नहीं होती... सुबह हुई कुछ लोग जाग रहे थे कुछ समय के मारे बिचारे एक दुसरे के ऊपर पैर रखकर, सर रखकर, सोये हुते थे, यहाँ तक कि सामान रखने के लिए जो रैक बना हुआ रहता है उस पर भी कुछ लोग बैठ कर बुरा वक़्त कटने का इंतज़ार कर रहे थे... तब तक दो लोग साधू वेश में आये एक के हाथ में त्रिशूल जिसमे डमरू लगा हुआ और एक हाथ में कुछ...
Rajnish Sharma
Rajnish Sharma 11 साल 7 महीने पहले
The government should implement a policy for contract employees. There should be no concept of third party. Suppose if the government is providing Rs. 150000 to an employee, the consultancy like KPMG are giving to its employee only Rs. 40000 to 50000. Why this type of odd things are happening in India. Government should provide the salary to all the employees directly to their bank accounts and not through any agency. T
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
तरह हम यात्री लोग दायें बाए भाग कर गाड़ी में घुसे... पर बैठने की जगह ज़रा भी नहीं पैर रखने की भी जगह नहीं...खड़े-खड़े कुछ दूर तक आये... फिर क्या अब कहानी और भी भयानक होने लगी हम ठीक से खड़े भी नहीं हो पाए थे कि ट्रेन "गुटखा, सिगरेट, पान मसाला बेचने वाले आना चालू किये, कभी चाय वाला, कभी संतरे वाला, कभी मूंगफली वाला... ये सब लोग आना चालू हो गया...इनसे परेशानी तो नहीं होनी चाहिए पर हुई क्यों कि ... बेबस, लाचार, बिना खाना खाए लोग बच्चे जो नीचे यहाँ वहाँ पड़े बिना सीट के लोग, जो भी रास्ते पड़ते सब से....
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
भगाओ भी मत हम लोग ढूंढ लेंगे.... उसमे से एक पुलिसवाले ने कहा "साहब से ऐसे बात करता है ? तुझे साहब के बारे में पता है कैसे हैं ? दिखाई नहीं दे रहा है की कितने पहलवान है कहीं एक पड़ गयी तो सीधे हो जाओगे, चलो निकलो यहाँ से" हम लोग वहां से निकले और दूसरी जगह जाकर बैठ गए दूसरी गाड़ी के आने का इंतज़ार कर रहे थे... गाडी संख्या "१२५४१ गोरखपुर एक्सप्रेस" जो की गोरखपुर से चलकर "मुंबई लोकमान्य तिलक टर्मिनस" के चलती है जो रात ११ बजकर ५० मिनट पर आई ... उसमे भी वही परेशानी पुलिस वालो ने परेशान किया.. किसी....
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
अगर किसी तरीके से बैठने के लिए जाये तो उसे डंडे डंडे से पीट रहे थे..भीड़ की वजह से कुछ बैठे कुछ नहीं बैठे कुछ के चप्पल निकल कर गिर गए कुछ खुद ही गिर पड़े छोटे आई... गाड़ी चल पड़ी और मैं भी नहीं बैठ सका, गाड़ी निकलने के बाद मेरे एक साथी का चप्पल भी ट्रेन की पटरी पे गिर गया उसे उठाने के लिए जब वो वह गया तो पुलिस भगाने लगी , कहने लगे की " साले बाटा का चप्पल था क्या जो परेशान हो ढूंढ रहा है चलो भागो यहाँ से" इतना बोल के सबको भगाने लगे... तो मैंने उनसे बोला सर जब आप हमारी मदद नहीं कर रहे हो तो हमें >>>
Rakesh Dubey
Rakesh Dubey 11 साल 7 महीने पहले
07 november ko main uttar pradesh ke basti district se train me travel kiya hu... uska exprience mujhe mila .... कुछ इस तरह है की मेरा संजोग टिकेट कन्फर्म न होने के कारण मुझे जनरल डिब्बे में ही आना पड़ा... रेलवे स्टेशन पर पुलिस जो की पब्लिक की सुविधा के लिए तैनात की है... यात्री लोग रेल गाड़ी में मदद करने बजाय एक तरफ खड़ा करके सबसे पैसे मांग रहे थे बोल रहे थे की... जो आदमी पैसा देगा वही डिब्बे के अन्दर जायेगा... कुछ लोग तो पैसे दिए और बैठे और जिस किसी ने नहीं दिया उसे बैठने ही नहीं दे रहे थे..आगे
Gopi Bulusu
Gopi Bulusu 11 साल 7 महीने पहले
I just reviewed the policy and and some of the referred documents. Government of India and Deity are well advised to create a single master vision and policy document with necessary annexures. Failure of the current framework is evident when one considers that Policy on open APIs will have to be at a higher level of abstraction than the technical standards which seems to have been finalized earlier. This is an important document and hope GoI gets it right.