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गुणवत्ता के लिए अभिशासन सुधार

Governance reforms for quality
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

इस विषय पर राज्य विश्वविद्यालयों और केन्द्र वित्तपोषित संस्थाओं ...

इस विषय पर राज्य विश्वविद्यालयों और केन्द्र वित्तपोषित संस्थाओं में बेहतर अभिशासन ढांचा बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के अपेक्षित सुधारों, जो उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार लाने में सहायक हों, के लिए सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं।

फिर से कायम कर देना
918 सबमिशन दिखा रहा है
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
हमे यहाँ भेजने वाले ने हमे जहाँ जिस घर मे जैसे भेजा है यहाँ आने का किस घर मे कौन माता पिता इसका चुनाव तो हमने नही किया ना कर सकते है | इसलिए हम कौन है कहाँ से आए है जाना कहाँ है जानने का प्रयाश करना चाहिए मानना नही चाहिए |
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
एक संसार को बनाने वाला एक हम सब मानव शरीर मूल रुप से एक जैसे ३२ दांत २०६ हड्डी, हम सब को बनाने वाला एक तो इतने धर्म कैसे, ये भेदभाव कैसा| वह खुद गोड भगवान एक हि है| वास्तव मे उसकी सच्ची जानकारी हि धर्म है | धर्म एक था है और रहेगा, सत्य एक था है और रहेगा| धर्म के ना होने क मतलब अधर्मी समाज| कृपया इन शब्दो को गम्भीरता से ले और सम्पूर्ण मानव समाज के कल्याण एवं जीवो के उद्धार हेतु भारतीय प्राचीनतम विद्यातत्त्वम पद्धति को शिक्षा मे शामिल करे|
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
उनका जीवन भौतिकता से मुक्त और आध्यात्मिकता में लिप्त रहता था।मानव प्रकृति की गोद से दूर नहीं रहता था।ऋषि की ख्याति के अनुरूप आश्रम चयन की सुविधा शिष्य के परिवार को रहती थी किन्तु आश्रम, धनवानों के आश्रम और निर्धनों के आश्रम में बंटे नहीं थे। राजा और रंक में किसी प्रकार का भेद नहीं था।
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
प्राचीन भारत का शिक्षा-दर्शन भी धर्म से ही प्रभावित था। शिक्षा का उद्देश्य धर्माचरण की वृत्ति जाग्रत करना था। शिक्षा, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए थी। धर्म का सर्वप्रथम स्थान था। धर्म से विपरीत होकर अर्थ लाभ करना मोक्ष प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध करना था। मोक्ष जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य था और यही शिक्षा का भी अन्तिम लक्ष्य था।। शिक्षा का लक्ष्य यह भी था कि आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो। उस समय भौतिक सुविधाओं के विकास की ओर ध्यान देना किंचित भी आवश्यक नहीं था |
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन धर्ममय था। जीवन के सभी कार्यकलाप धर्म से ओत-प्रोत थे, धर्म से नियंत्रित थे। धर्म द्वारा, धर्म के लिए और धर्ममय जीवन शैली प्राचीन भारत की विशेषता थी। प्राचीन युग की प्रधानता होने से राजनीति में हिंसा और शत्रुता, द्वेष और ईर्ष्या, परिग्रह और स्वार्थ का बहुल्य न होकर, प्रेम, सदाचार त्याग और अपरिग्रह महत्वपूर्ण थे। जीवन का आदर्श ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ था। जीवन का उद्देश्य धर्म था। धर्ममय जीवन भौतिक उपलब्धियों से श्रेष्ठ माना जाता था।
Nepal Singh Patel
Nepal Singh Patel 11 साल 1 महीना पहले
क्या कोइ सरकारी शिक्षालय मे सरकारी शिशक के पुत्र या पुत्री शिक्षा के लिए जाते है? क्यों नही? क्या हमारे देश मे अच्छे शिक्षक नही? या अच्छे शिक्षालय नही? शिक्षा, शिक्षक,शिक्षालय को विद्या,विद्यार्थी,अध्यापक और ज्ञान,ज्ञानार्थी,ज्ञानालय से replace किया जाना चाहिए|
Anbumani D
Anbumani D 11 साल 1 महीना पहले
my suggestion regarding governance central research centers recruitment of faculty and research staff are purely biased no merit based. if the faculty member is higher position like assistant professor or director they recruit their spouse and relative and known persons irrespective any qualification and experience other have even they change the notification based on their need. to curb these i suggest my government good and efficient law in each and every stab of process
BELADIYA BHARAT B
BELADIYA BHARAT B 11 साल 1 महीना पहले
We always have expectation from a teacher, but we never ask what a teacher actually needed for facilitate the teaching-learning activity. The best infrastructure facilities should incorporated in an eduction campus. We must have trust & faith on the teacher. Enough working freedom should be given to the teacher and then we can have our expectation from the teachers to be full-filled.