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विद्यार्थियों के अधिगम परिणामों में सुधार लाने के लिए स्कूपल शिक्षा में विज्ञान, गणित और प्रौद्योगिकी के अध्यापन के लिए नया ज्ञान, शिक्षा शास्त्र और दृष्टिकोण

New Knowledge, pedagogies and approaches for teaching of Science, Maths and Technology in School Education to improve learning outcomes of Students
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

दसवीं बोर्ड परीक्षा में 80% छात्र विज्ञान और गणित (अंग्रेजी) में कमजोर ...

दसवीं बोर्ड परीक्षा में 80% छात्र विज्ञान और गणित (अंग्रेजी) में कमजोर अध्यापन की वजह से फेल होते हैं। उच्चतर माध्यामिक स्तर पर विज्ञान विषय में कम दाखिला और गुणवत्ता रहित शिक्षा, देश में वैज्ञानिक कार्मिकों के विकास में बाधा है। विज्ञान और गणित शिक्षा में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हमसे यह अपेक्षित है कि हम विचार-विमर्श करके बेहतर परिणामों के लिए शिक्षण- अधिगम प्रक्रियाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के वास्ते पाठ्यचर्या, अध्यापन और अधिगम स्तर में सुधारके लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग के मामलों में अभिनवता तथा विविध दृष्टि‍कोणों के लिए व्यावहारिक कार्यनीतियां तलाशनी होंगी।

फिर से कायम कर देना
712 सबमिशन दिखा रहा है
Abhishek Choudhari
Abhishek Choudhari 11 साल 2 महीने पहले
Our students are at a major disadvantage in the world due to the way we count numbers. Please on priority change it. We should teach kids to count in 100,000 / million / billion / trillion format. The lakh and crore concept should be done away with immediately. Even today I have trouble calculating how many rupees is 25 million exactly (it is 2.5 crore). All the world's financial transactions are done in million format. Please do change this. thanks
Savita Arya
Savita Arya 11 साल 2 महीने पहले
1 . शिक्षा (Education) 2 . स्वाध्याय (Self Realization) 3 . अध्यात्म (Spiritualisation) और 4 .तत्त्वज्ञान ; (True, Supreme & Perfect KNOWLEDGE) अथवा विद्यातत्त्वम् पद्धति ।
Savita Arya
Savita Arya 11 साल 2 महीने पहले
शिक्षा प्रणाली आज की इतनी गिरी हुई एवं ऊल-जलूल है कि आज शिक्षा क्या दी जानी चाहिए ? और शिक्षा क्या दी जा रही है यह तो ऐसा लग रहा है कि शिक्षार्थी तो शिक्षार्थी ही है, यदि शिक्षक महानुभावों से भी पूछा जाय, तो वे महानुभाव भी पूरब के बजाय पश्चिम और उत्तर के वजाय दक्षिण की बात बताने-जनाने लगेंगे। इसमें उनका भी दोष कैसे दिया जाय, क्योंकि जो जैसे पढ़ेगे-जानेंगे, वे वैसे ही तो पढ़ायेंगे-जनायेंगे भी । इसमें उनका दोष देना भी व्यर्थ की बात दिखलाई देती है ।
Savita Arya
Savita Arya 11 साल 2 महीने पहले
वास्तव में जब तक पिण्ड और ब्रह्माण्ड के तुलनात्मक अध्ययन के साथ उसमें आपस में तालमेल बनाये रखने हेतु पृथक्-पृथक् पिण्ड और ब्रह्माण्ड की यथार्थतः प्रायौगिक और व्यावहारिक जानकारी तथा ब्रह्माण्डीय विधान मात्र ही पिण्ड का भी विधि-विधान यानी स्थायी एवं निश्चयात्मक विधि-विधान ही नहीं होगा तथा एक मात्र ब्रह्माण्डीय विधि-विधान को अध्ययन पद्धति या शिक्षा प्रणाली के रूप में लागू नहीं किया जायेगा, तब तक अभाव एवं अव्यवस्था दूर नहीं किया जा सकता है, कदापि दूर हो ही नहीं सकता ।
Savita Arya
Savita Arya 11 साल 2 महीने पहले
तो उसके स्थान पर नई कौन सी अथवा कैसी शिक्षा पद्धति हो या होना चाहिए, यह बात या सिद्धान्त या फार्मूला कोई नहीं दे रहा है कि शिक्षा में यह बात या यह विधि-विधान या ऐसी प्रणाली लागू किया जाय । इसी समस्या के समाधान में निम्नलिखित ‘शिक्षा पद्धति’ प्रस्तुत किया जा रहा है । ‘शिक्षा’ पूर्णतः ब्रह्माण्डीय विधि-विधान पर ही आधारित हो भगवत् कृपा विशेष से प्राप्त सदानन्द का ‘मत’ तो यह है कि--‘‘शिक्षा पिण्ड और ब्रह्माण्ड में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’
Narendra Kumar Pal
Narendra Kumar Pal 11 साल 2 महीने पहले
तो उसके स्थान पर नई कौन सी अथवा कैसी शिक्षा पद्धति हो या होना चाहिए, यह बात या सिद्धान्त या फार्मूला कोई नहीं दे रहा है कि शिक्षा में यह बात या यह विधि-विधान या ऐसी प्रणाली लागू किया जाय । इसी समस्या के समाधान में निम्नलिखित ‘शिक्षा पद्धति’ प्रस्तुत किया जा रहा है । ‘शिक्षा’ पूर्णतः ब्रह्माण्डीय विधि-विधान पर ही आधारित हो भगवत् कृपा विशेष से प्राप्त सदानन्द का ‘मत’ तो यह है कि--‘‘शिक्षा पिण्ड और ब्रह्माण्ड में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’
Narendra Kumar Pal
Narendra Kumar Pal 11 साल 2 महीने पहले
वास्तव में जब तक पिण्ड और ब्रह्माण्ड के तुलनात्मक अध्ययन के साथ उसमें आपस में तालमेल बनाये रखने हेतु पृथक्-पृथक् पिण्ड और ब्रह्माण्ड की यथार्थतः प्रायौगिक और व्यावहारिक जानकारी तथा ब्रह्माण्डीय विधान मात्र ही पिण्ड का भी विधि-विधान यानी स्थायी एवं निश्चयात्मक विधि-विधान ही नहीं होगा तथा एक मात्र ब्रह्माण्डीय विधि-विधान को अध्ययन पद्धति या शिक्षा प्रणाली के रूप में लागू नहीं किया जायेगा, तब तक अभाव एवं अव्यवस्था दूर नहीं किया जा सकता है, कदापि दूर हो ही नहीं सकता ।