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विनियम की कोटि में सुधार

Improving the quality of regulation
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

वर्तमान विनियामक प्रणाली हमारी संस्थाओं की गुणवत्ता और प्रगति में ...

वर्तमान विनियामक प्रणाली हमारी संस्थाओं की गुणवत्ता और प्रगति में बाधाएं खड़ी करती है। मौजूदा विनियामक अभिकरणों और उनके तौर-तरीकों में क्या-क्या सुधार अपेक्षित हैं जिनसे हमारी संस्थांओं को अधिक शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्ता दी जाए ताकि उनकी गुणवत्ता बढ़ाई जा सके।

फिर से कायम कर देना
408 सबमिशन दिखा रहा है
Rishabh Nigam
Rishabh Nigam 11 साल 1 महीना पहले
Use the GLOBAL best practices in regulation i.e. policy making on the basis of facts, proven designs, factual analysis, and numbers, and not PERCEPTION and good intentions. for eg, the idea shouldn't be to put controls but to create an ecosystem of creativity between academia & industry and to incentivise innovation! No unitary criteria for all, but rather give govt and pvt colleges their freedom to be creative in deciding curricula. just link salary, ratings and grants according to performance.
Avinash Chander
Avinash Chander 11 साल 1 महीना पहले
अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। अध्ययन-अध्यापन और ‘ज्ञान’ समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यतः आवश्यक विधान है । ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा अनिवार्य होना चाहिये ! विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि ‘पिण्ड और ब्रह्माण्ड’ की यथार्थतः जानकारी के साथ ही दोनों में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’ ।
Monika Kawadia
Monika Kawadia 11 साल 1 महीना पहले
अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। अध्ययन-अध्यापन और ‘ज्ञान’ समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यतः आवश्यक विधान है । ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा अनिवार्य होना चाहिये ! विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि ‘पिण्ड और ब्रह्माण्ड’ की यथार्थतः जानकारी के साथ ही दोनों में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’ ।
megha tripathi
megha tripathi 11 साल 1 महीना पहले
अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। अध्ययन-अध्यापन और ‘ज्ञान’ समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यतः आवश्यक विधान है । ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा अनिवार्य होना चाहिये ! विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि ‘पिण्ड और ब्रह्माण्ड’ की यथार्थतः जानकारी के साथ ही दोनों में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’ ।
Pankaj ji
Pankaj ji 11 साल 1 महीना पहले
अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। अध्ययन-अध्यापन और ‘ज्ञान’ समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यतः आवश्यक विधान है । ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा अनिवार्य होना चाहिये ! विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि ‘पिण्ड और ब्रह्माण्ड’ की यथार्थतः जानकारी के साथ ही दोनों में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’ ।
SUSHEEL DUBEY
SUSHEEL DUBEY 11 साल 1 महीना पहले
अध्ययन-अध्यापन और ज्ञान पर ही समाज का पूरा भविष्य आधारित है। अध्ययन-अध्यापन और ‘ज्ञान’ समाज सुधार और जीवोद्धार तथा सुखी-सम्पन्न समाज हेतु सर्वप्रथम सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सभी के लिए ही एक अनिवार्यतः आवश्यक विधान है । ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा अनिवार्य होना चाहिये ! विद्या को कभी भी व्यावसायिक नहीं अपितु लक्ष्यमूलक व्यावहारिक ही होना चाहिए । यह तब ही सम्भव है जब कि ‘पिण्ड और ब्रह्माण्ड’ की यथार्थतः जानकारी के साथ ही दोनों में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’ ।