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आरंभ करने की तिथि :
Mar 12, 2020
अंतिम तिथि :
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
कौन थे गुरु तेग बहादुर!
श्री गुरु तेगबहादुर जी सिखों के नौवें गुरु हैं, उनका जन्म 1 अप्रैल 1621 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिताजी का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह था। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता, हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई। इसी समय इन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की।
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
इसके बाद गुरु तेग बहादुर ने उनकी इफाजत का जिम्मा अपने सिर से ले लिया। गुरु तेग बहादुर के इस कदम से औरंगजेब गुस्से से भर गया। लेकिन इस सब से निरफिकर होकर गुरु तेग बहादुर अपने तीन शिष्यों के साथ मिलकर आनंदपुर से दिल्ली के लिए चल पड़े।इतिहासकारों का मानना है कि मुगल बादशाह ने उन्हें गिरफ्तार करवा कर तीन-चार महीने तक कैद करके रखा, बहुत यातनाएं दी ताकि वो टूट जाएं। लेकिन उन्होंने जो संकल्प लिया था उसे पूर्ण करने के लिए वो अडिग रहे। कहते हैं कि इसके बाद पिजड़े में बंद करके उन्हें सल्तनत की राजधानी दिल
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
कश्मीरी पंडितों के लिए ढाल बने गुरु तेग बहादुर
वैसे तो गुरु तेग बहादुर जी से औरंगजेब शुरुआत से ही चिढ़ता था। लेकिन उनकी औरंगजेब से जंग तब हुई, जब क्रूर औरंगजेब कश्मीरी पंडितों को जबरन मुसलमान बनाने पर तुला हुआ था। कश्मीरी पंडित इसका विरोध कर रहे थे, लेकिन उन्हें डराकर उनके विरोध को दरकिनार किया जा रहा था। इसके बाद पंडित कृपा रामजी ने कश्मीरी पंडितों को अपने साथ लिया और आनंदपुर साहिब जाकर गुरु तेग बहादुर से भेंट कर उनसे मदद मांगी।
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
ऐसे में जब गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब के हुक्म को मानने से इनकार कर दिया तो लोगों में कौतूहलता बढ़ गई कि आखिर वो साहसी शेर दिल है कौन! औरंगजेब की सभा में गुरु तेग बहादुर और उनके शिष्यों को पेश किया गया। एक एक कर उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए पूछा गया, जिससे उन्होंने साफ इनकार कर दिया।
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
जब गुरु तेग बहादुर और उनके शिष्यों को दिल्ली लाया गया, तो उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो गई। ऐसा इसलिए भी हुआ कि उस समय क्रूर औरंगजेब के सामने नज़रे उठाने का साहस किसी व्यक्ति में नहीं था और सब उसकी क्रूरता सहते जा रहे थे। ऐसे में जब गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब के हुक्म को मानने से इनकार कर दिया तो लोगों में कौतूहलता बढ़ गई कि आखिर वो साहसी शेर दिल है कौन! औरंगजेब की सभा में गुरु तेग बहादुर और उनके शिष्यों को पेश किया गया। एक एक कर उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए पूछा गया, जिससे........
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
लेकिन गुरु तेग बहादुर पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ, वो भरी सभा में औरंगजेब के हुक्म के विरोध में खड़े रहे और इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया। उन्होंने गर्व से कहा - मैं मर जाऊंगा लेकिन इस्लाम धर्म नहीं अपनाऊंगा। इस पर औरंगजेब ने उनके बचे हुए शिष्यों के सामने उनका सिर कटवा दिया। इसी बलिदान की याद में 24 नवंबर को प्रतिवर्ष बलिदान दिवस मनाया जाता है। जिस स्थान पर गुरु तेग बहादुर का शीश यानी सिर काटा गया था, वो जगह दिल्ली में है और अब शीशगंज गुरुद्वारे के नाम से जाना जाता है।
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
अब औरंगजेब गुस्से से पागल हो रहा था, उसने अपने सैनिकों से कहकर गुरु तेग बहादुर के सामने ही उनके शिष्यों के सिर कलम कर दिये ताकि उन्हें डराया जा सके। लेकिन इससे उलट गुरु जी की आंखों में लेश मात्र भी डर नहीं था। इसके बाद तो गुस्से में बौखलाए औरंगजेब ने वहीं उनके भाई मति दास के शरीर के दो टुकड़े करवा डाले, फिर भाई दयाल सिंह के शरीर को भी टुकड़ों में बांट दिया और तीसरे भाई सति दास को भी दर्दनाक मौत के घाट उतार दिया। लेकिन गुरु तेग बहादुर पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ, वो भरी सभा में औरंगजेब के हुक्म..
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज़ादी के बाद पिछले 73 वर्षों में हमने अपने महा-पुरुषों को वो सम्मान नहीं दिया, जिसके वो हकदार थे। हमारे देश में लुटेरे मूल के मुगल शासकों जैसे औरंगजेब और अकबर के बारे में आपको कई पुस्तकें मिल जाएंगी। यहां तक कि पाठ्यपुस्तकों में इनकी कहानियां शामिल हैं और कुछ लेखकों ने तो बड़ी बेशर्मी से इनकी प्रशंसा करते हुए इन्हें महान भी बताया गया है। लेकिन जिन महापुरुषों ने इन राजाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपना बलिदान दिया उनकी चर्चा कम या न के बराबर ही होती है।
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Abhey Kumar Rajput
5 साल 7 महीने पहले
गुरु तेग बहादुर कोई राजा नहीं थे जो अपने वचन को पूरा करने के लिए बाध्य होते। वो चाहते तो कश्मीरी पंडितों की मदद करने से मना कर सकते थे और अपनी जान बचा सकते थे। पर उन्होंने धर्म का मार्ग चुना क्यों कि उनका उपदेश था, "धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है"। गुरु तेग बहादुर द्वारा निभाये गए इसी बलिदान की परंपरा पर देश को गर्व है। हमें अपने असली नायकों को पहचानना चाहिए और उन्हीं का सम्मान करना चाहिए न कि लुटरे मूल के क्रूर शासकों का।
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Dr Guinness Madasamy
5 साल 7 महीने पहले
It declares India to be a sovereign, secular, socialist, and democratic republic and assures its citizens' equality, liberty, and justice.
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